Read Inspiring Story Of Patiala Teacher On Teachers Day 2022 – दिव्यांग अध्यापक के हौसले की कहानी: बच्चों की तकदीर और स्कूलों की तस्वीर बदली, अब मिलेगा अवार्ड

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पोलियो के चलते आई 80 फीसदी दिव्यांगता के कारण 55 साल के गुरमीत सिंह भले ही बैसाखियों के सहारे चलते हैं लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं। 2002 में बतौर सरकारी शिक्षक अध्यापन का काम शुरू किया तो मन में ठाना कि केवल बच्चों को पढ़ाना ही उनका लक्ष्य नहीं रहेगा। बल्कि वह स्कूलों की तस्वीर भी बदलेंगे और साथ ही बच्चों के सर्वपक्षीय विकास पर भी जोर देंगे। 

गुरमीत सिंह ने इस पर पूरी तरह से अमल किया। अब तक वह पांच स्कूलों में बतौर शिक्षक अपनी सेवाएं दे चुके हैं और इस समय वह सरकारी प्राइमरी स्कूल कनसुहा कलां में हेड टीचर तैनात हैं। गुरमीत सिंह ने सरकारी स्कूल में बतौर टीचर अपनी सेवाओं के दौरान जब देखा कि बरसात के दिनों में गांव के टोभे का पानी स्कूल इमारत के अंदर घुस आता है, इमारत भी असुरक्षित है, जिसके चलते गांव के लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजना नहीं चाहते तो उन्होंने अपने स्तर पर कुछ एनआरआई से संपर्क करके उनसे आर्थिक मदद ली। 

इसके अलावा ग्राम पंचायत और सरकार से आर्थिक मदद लेकर उन्होंने 25 लाख की लागत से पूरी इमारत को नए सिरे से तैयार कराया। इसमें चार कमरों के अलावा दफ्तर, रसोई का निर्माण कराया और स्कूल इमारत की चारदीवारी भी कराई। इसी तरह से धन्नौरी स्कूल की छत बारिश के दिनों में टपकती थी। इसकी मरम्मत कराने के अलावा यहां एक नया कमरा व शौचालय बनवाया। 

लचकानी स्कूल में भी पंचायत के सहयोग से नया कमरा बनवाया। बिजली जाने पर बच्चों को होने वाली परेशानी के मद्देनजर जिस स्कूल में तैनाती हुई, वहां इन्वर्टर के अलावा आरओ, वाटर कूलर और झूले व अन्य सुविधाएं दीं।

बच्चों को खेल किट और स्टेशनरी भी मुहैया कराई। इसके अलावा बच्चों के सर्वपक्षीय विकास के लिए उन्हें प्रोत्साहन देकर ब्लाक व जिला स्तर के खेल, चित्रकारी, लेखन, गायन व अन्य मुकाबलों में भाग दिलाया। हेड टीचर गुरमीत सिंह की इन्हीं उपलब्धियों को देख पंजाब सरकार ने इस साल स्टेट अवार्ड के लिए उन्हें चयनित किया है। इससे स्कूल के बच्चों व इलाके में काफी खुशी का माहौल है। 
  
अमर उजाला से बात करते वक्त गुरमीत सिंह ने कहा कि वह स्टेट अवार्ड के लिए चयनित होने पर काफी खुश हैं। उनका यही लक्ष्य है कि वह आगे भविष्य में भी स्कूलों में बच्चों को अच्छी शिक्षा व सुविधाएं देने पर इसी तरह मेहनत और लगन से काम करते रहें।

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पोलियो के चलते आई 80 फीसदी दिव्यांगता के कारण 55 साल के गुरमीत सिंह भले ही बैसाखियों के सहारे चलते हैं लेकिन उनके हौसले बुलंद हैं। 2002 में बतौर सरकारी शिक्षक अध्यापन का काम शुरू किया तो मन में ठाना कि केवल बच्चों को पढ़ाना ही उनका लक्ष्य नहीं रहेगा। बल्कि वह स्कूलों की तस्वीर भी बदलेंगे और साथ ही बच्चों के सर्वपक्षीय विकास पर भी जोर देंगे। 

गुरमीत सिंह ने इस पर पूरी तरह से अमल किया। अब तक वह पांच स्कूलों में बतौर शिक्षक अपनी सेवाएं दे चुके हैं और इस समय वह सरकारी प्राइमरी स्कूल कनसुहा कलां में हेड टीचर तैनात हैं। गुरमीत सिंह ने सरकारी स्कूल में बतौर टीचर अपनी सेवाओं के दौरान जब देखा कि बरसात के दिनों में गांव के टोभे का पानी स्कूल इमारत के अंदर घुस आता है, इमारत भी असुरक्षित है, जिसके चलते गांव के लोग अपने बच्चों को स्कूल भेजना नहीं चाहते तो उन्होंने अपने स्तर पर कुछ एनआरआई से संपर्क करके उनसे आर्थिक मदद ली। 

इसके अलावा ग्राम पंचायत और सरकार से आर्थिक मदद लेकर उन्होंने 25 लाख की लागत से पूरी इमारत को नए सिरे से तैयार कराया। इसमें चार कमरों के अलावा दफ्तर, रसोई का निर्माण कराया और स्कूल इमारत की चारदीवारी भी कराई। इसी तरह से धन्नौरी स्कूल की छत बारिश के दिनों में टपकती थी। इसकी मरम्मत कराने के अलावा यहां एक नया कमरा व शौचालय बनवाया। 

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