Oscar Award 2023: ऑस्कर की आस सालाना रिवायत से आगे बढ़ें | – News in Hindi

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अगले साल होने वाले 95वें ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भारत की ओर से आधिकारिक प्रविष्टि के रूप से भेजी गयी फिल्म का क्या नाम है? सोचकर रखिए, तब तक आगे बढ़ते हैं. क्या आप जानते हैं कि निर्देशक राजामौली की फिल्म ‘आरआरआर’ को आधिकारिक तौर पर भारत की ओर से ऑस्कर के लिए नहीं भेजा गया है? न भेजी जाने वाली फिल्मों में निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की ‘दि कश्मीर फाइल्स’ और अयान मुखर्जी निर्देशित ‘ब्रह्मास्त्र’ भी है. इन तीनों फिल्मों के नाम आपकी उत्सुकता बढ़ा रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि जो मैं आगे कहने जा रहा हूं वह शायद सही ट्रैक पर है.

दरअसल, सुपरहिट का तमगा ना चिपका हो तो ऑस्कर अवार्ड्स के लिए भेजी जाने वाली अधिकतर भारतीय फिल्में सिनेमाघर में कब आई और कब गई, आसानी से पता नहीं लगता. उदाहरण के लिए तीन साल पहले 92वें ऑस्कर के लिए भेजी गई रनवीर सिंह और आलिया भट्ट की फिल्म ‘गली ब्वाय’, खासी चर्चा में थी, क्योंकि नामचीन सितारों की इस फिल्म को व्यावसायिक रूप से खासी सफलता (238 करोड़ रुपए) मिली थी. इसी तरह से 74वें ऑस्कर के लिए भेजी गई आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ (2001), जो बॉक्स ऑफिस पर पर हिट रहने के साथ-साथ नामांकन पाने में भी सफल रही.

30वें ऑस्कर के लिए महबूब खान निर्देशित ‘मदर इंडिया’ (1957) और 61वें के लिए मीरा नायर की ‘सलाम बांबे’ (1988) के बाद ‘लगान’ तीसरी सफल फिल्म थी, जिसे मुख्य प्रतियोगिता के लिए नामित होने का अवसर प्राप्त हुआ था. तब से लेकर आज 21 वर्ष होने को आए, कोई भी फिल्म यहां तक नहीं पहुंच पाई है. कई और उदाहरण भी हैं, जिनका जिक्र आगे होता रहेगा.

जलसा सालाना बहस का

वैसे, साल 2023 में होने वाले ऑस्कर के लिए आधिकारिक तौर पर चुनी गई फिल्म का नाम ‘लास्ट फिल्म शो’ है. यह गुजराती भाषा में बनी फिल्म है, जिसे ‘छेल्लो शो’ या छेल्लो सिनेमा के नाम से भी पुकारा जा रहा है. सितंबर में ऑस्कर के लिए चुने जाने के कुछ सप्ताह बाद यह फिल्म सिनेमाघरों में रिलीज की गई, जिसे महज एक औपचारिकता ही कहा जा सकता है. जल्द ही यह ओटीटी पर भी उपलब्ध होगी. इस बीच आरआरआर ने 14 अलग-अलग श्रेणियों में इंडीपेंडेंट फिल्म के तौर पर अपनी दावेदारी पेश कर ऑस्कर की सालाना बहस को और तेज कर दिया है.

सालाना बहस इसलिए, क्योंकि हर साल हम एक नया कारण खोज लाते हैं, ऑस्कर न मिलने का. कभी फिल्म का चुनाव सही नहीं होता, तो कभी लॉबिंग ठीक से नहीं की जाती. कभी किसी फिल्म पर नेपोटिज्म का आरोप लगता है तो कभी मेकिंग के दोष निकाले जाते हैं. साल 2007 में आई विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘एकलव्यः दि रॉयल गार्ड’, को 80वें ऑस्कर के लिए भेजे जाने पर पंकज कपूर अभिनीत फिल्म ‘धर्म’ (2007) की निर्देशक भावना तलवार कोर्ट तक पहुंच गई थीं. तो साल 2012 में आई अनुराग बसु निर्देशित एवं रणबीर कपूर-प्रियंका चोपड़ा अभिनीत फिल्म ‘बर्फी’, जिसे 85वें ऑस्कर के लिए भेजा गया था, पर प्रेरणा के नाम पर सीधे-सीधे सीन कॉपी के आरोप लगे. इस बार छेल्लो सिनेमा को लेकर भी कई तरह की बातें सामने आई हैं. ऑस्कर पाने की राह में अवरोधों, आरोपों और दोषों की लंबी दास्तान रही है.

कसौटी की बात से किनारा क्यों

हालांकि इस पर बहुत कम बहस होती कि हम कितनी ईमानदारी से फिल्में बना रहे हैं. किसी फिल्म का 300 या 500 करोड़ का बजट चर्चा में रहता है. वीएफएक्स पर चर्चा होती है, कितने देशों में शूट की गई और प्रोडक्शन वैल्यू पर ढेरों खबरें बनती हैं. लेकिन अपने विषय, ऐतिहासिक तथ्यों या सामयिक चित्रण को लेकर सत्ययता, प्रमाणिकता और विश्वसनीयता की कसौटी पर हमारी फिल्में कहां ठहरती हैं? अक्सर कई फिल्मकार किसी देसी-विदेशी फिल्म से प्रेरणा या प्रेरित होने की बात करते हैं, लेकिन मूल कृति के साथ वह कितना न्याय कर पाए, इसका आकलन नहीं होता. या फिर तमाम शोधों के बाद ऐसे तथ्यों और जानकारियों का क्या फायदा, जो बाद में असत्य पाए जाएं या ढंग से परोसे ही न जा सकें.

दो उदाहरण प्रस्तुत हैं. पहला है, निर्देशक जेम्स कैमरून की फिल्म ‘टाइटैनिक’ (1997) का, जो 70वें ऑस्कर में 14 श्रेणियों में नामांकन पाने में सफल रही तथा 11 ऑस्कर उसके नाम रहे. विश्वव्यापी रूप से अपार सफलता के बाद साल 2012 में नील दिग्रासे टायसन, एक अमेरिकी खगोल भौतिज्ञ, ने कैमरून का ध्यान फिल्म के एक सीन की ओर खींचा. बताया कि रोज (केट विंसलेट) क्लाईमैक्स, जिस सीन में आसमान में सितारों की तरफ देख रही है, में दर्शाया गया स्टारफील्ड सन् 1912 में उस अक्षांश और देशांतर के अनुरूप प्रतीत नहीं होता. टायसन का दावा खगोलीय पिंडों की रचना तथा उनके भौतिक लक्षणों के अध्ययन के आधार पर था, जिस पर कैमरून ने भूल सुधार की बात कही और टायसन से सही संरचना भेजना को कहा, ताकि उस सीन को दुरुस्त किया जा सके.

हालांकि, हम फिल्म मेकिंग के अभी उस दौर में नहीं पहुंचे हैं, जहां किसी ऐतिहासिक महत्व या साइंस फिक्शन फिल्म में इतनी बारीकी और गहनता से काम गया हो. किसी साइंस फिक्शन फिल्म के लिए निर्देशक का वैज्ञानिक बनना आवश्यक बेशक न हो, लेकिन वैज्ञानिक सोच और वैसा दृष्टिकोण तो अपनाया ही जा सकता है.

खैर, दूसरा उदाहरण है ‘आरआरआर’ जिसे 1200 करोड़ रुपए की शानदार व्यावसायिक सफलता के साथ-साथ दुनियाभर में ख्याति और प्रशंसा मिली है. अमेरिकी अभिनेता डैनी दिविटो से लेकर जेम्स गन, दि रूसो ब्रदर्स, स्कॉट डेरिक्सन, लैरी काराज्वेस्की, जैक्सन लेनजिंग, डेनियल क्वान, इगार राइट सरीखे फिल्मकारों ने फिल्म की तारीफ की है. जाहिर है, ऑस्कर को लेकर इसके मेकर्स के हौसले काफी बुलंद हैं और उम्मीद की जा रही है कि वीएफएक्स श्रेणी में नामांकन पाने में यह फिल्म सफल हो सकती है. आरआरआर ने बेस्ट पिक्चर, निर्देशक, ओरिजनल स्क्रीनप्ले, सहायक अभिनेता, सहायक अभिनेत्री, बेस्ट एक्टर, सिनेमाटोग्राफी, मेकअप, कास्ट्यूम आदि में भी नामांकन भरा है.

प्रामाणिकता और कठिनाइयां

असल पात्रों और घटनाओं से प्रेरित ‘आरआरआर’ की कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है, जिसके पार्श्व में ब्रिटिश राज और सन् 1920 की दिल्ली और उसके आस-पास के इलाके हैं. कहानी में अगर दावे से कुछ कहा नहीं गया है, तो दावे से कुछ दिखाया भी नहीं गया है. यानी राजामौली की इस ऐतिहासिक फिल्म में चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली, यमुना का तट और पुराने लोहे के पुल का चित्रण वैसा ही है, जैसा करण जौहर ने अपनी फिल्म ‘कभी खुशी कभी गम’ (2001) में चांदनी चौक का चित्रण किया था.

हालांकि ऑथेंटिसिटी का दावा करण जौहर ने भी नहीं किया था, तो क्या राजामौली को भी जौहर जैसी छूट मिलनी चाहिए? ऑस्कर की रेस में नामांकन पाने में सफल रही ‘लगान’ भी एक काल्पनिक कथा थी, जो बीआर चोपड़ा निर्देशित एवं दिलीप कुमार एवं वैजयंतीमाला अभिनीत फिल्म ‘नया दौर’ (1957) से प्रेरित थी. इसकी पृष्ठभूमि सन् 1893, ब्रिटिश छावनी दिखाई गई है. तारीखी तौर पर इसमें भी कोई दावा नहीं किया गया है, लेकिन काल्पनिक होने के बावजूद अहसास नहीं होता कि किसी चीज के प्रति प्रमाणिकता आवश्यक है, जबकि ‘आरआरआर’ की पृष्ठभूमि इससे 30 वर्ष आगे की है. आज के फिल्मकारों और उनकी रिसर्च टीम से इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि बीते सौ वर्षों का इतिहास और महत्व की चीजों पर जानकारी जुटाने में वह जी नहीं चुराते होंगे.

दरअसल, अब जाकर हम फिल्म मेकिंग के एक ऐसे दौर में पहुंचे हैं, जहां काल्पनिकता और सिनेमायी स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी हजम करने की गुंजाइश कम होती जा रही है. ऑस्कर या इसके समकक्ष मंचों पर डिस्क्लेमर का महत्व नहीं रह जाता, जो कहता है कि इस काल्पनिक कहानी का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना-देना नहीं या यह महज एक संयोग हो सकता है. क्योंकि जब फिल्मकार कहते हैं कि यह पीरियड ड्रामा है, तो इसका मतलब है कि उन्होंने औरों से अलग से कुछ खास काम किया है. सामने वाला भी उसे इसी आधार पर जांचता है, जिसके बिंदु सत्यता और सटीकता के दायरे को इंगित करते हैं. दुनियाभर के अलग-अलग तरह के कंटेंट को चखने के बाद अब हमारा दर्शक भी पहले जैसा नहीं रहा. इसलिए ‘आरआरआर’ ने इंडीपेंडेंट के तौर पर ऑस्कर के लिए दस्तक तो दी है, लेकिन पूर्व में आधिकारिक तौर पर भेजी गई प्रविष्टियों से यह अलग नहीं दिखती.

विवादों की रिवायत

वैसे, ‘आरआरआर’ और ‘दि कश्मीर फाइल्स’ के अलावा ‘ब्रह्मास्त्र’, ‘बधाई दो’, ‘रॉकेट्रीः दि नाम्बी इफेक्ट’, ‘अनेक’, ‘झुंड’, ‘अपराजितो’, ‘स्थलम’, ‘इराविन निझल’ सहित 13 फिल्मों को पछाड़कर ‘छेल्लो शो’ को सफलता मिली है. हालांकि छेल्लो सिनेमा को लेकर 1988 में आयी इटेलियन फिल्म, सिनेमा पैराडिसो, से समानता की बातें भी सामने आई हैं. ये भी कि यह फिल्म एक विदेशी बैनर द्वारा बनाई गई, जिसे बाद में एक भारतीय बैनर ने खरीदा और इस फिल्म ने पिछले साल भी ऑस्कर के लिए आवेदन किया था.

बताया जाता है कि फिल्म ‘8 माइल’ (2002) से समानता के आरोपों का सामना जोया अख्तर निर्देशित, ‘गली ब्वाय’ को भी करना पड़ा था. संभवतः इसी वजह से फिल्म का ऑस्कर से नामांकन भी रद्द हुआ. वैसे, कई फिल्मकार मानते हैं कि ऑस्कर में नामांकन पाने का कोई निश्चित पैमाना नहीं है. कुछ ऐसा ही भाव ऑस्कर के लिए फिल्म चुनते समय हमारे यहां भी दिखता है. छेल्लो सिनेमा को चुने की वजह, इसके कहानी कहने के तरीके और दुनिया का ध्यान खींचने की ताकत, बताया जाता है.

दरअसल, यह एक ऐसी वजह है जो चुनी गई लगभग हर सफल फिल्म पर जंचती है. लेकिन हमें देखना चाहिये कि बीते साल विक्की कौशल की फिल्म को न चुनने के पीछे क्या कारण थे. क्योंकि कई बार चुनी गयी फिल्मों से ज्यादा न चुनी गई फिल्मों की दास्तान अधिक ध्यान खींच ले जाती है. शूजीत सरकार निर्देशित ‘सरदार उधम’ (2021) का नामांकन ऑस्कर भेजी जाने वाली सूची से इसलिए हटा दिया गया था, क्योंकि यह फिल्म भारतीयों का ब्रिटिशों के प्रति नफरत का अत्यधिक चित्रण करती है. और ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में नफरत पाले रखना ठीक नहीं है.

यह जानने के बाद कुछ लोग शायद उत्सुकतावश देखना चाहेंगे कि अत्यधिक नफरत से आखिर तात्पर्य क्या है. और जिन लोगों ने यह फिल्म देखी है, वह शायद बार-बार यह पंक्तियां पढ़ें कि अत्याधिक नफरत का चित्रण, क्या वाकई ब्रिटिशों के प्रति ज्यादती है. एक पल को मान लीजिए कि अगर इस साल ‘आरआरआर’ को ही चुनना पड़ता, तो क्या फिर से अत्यधिक नफरत की बात नहीं उठती. क्योंकि फिल्में तो दोनों ही ब्रिटिश शासन के अत्याचारों का चित्रण करती हैं. या काल्पनिक कहानी के नाम पर किसी प्रकार की विशेष छूट का भी प्रावधान है. या यह माना जाए कि लगान को इसलिए चुना गया, यहां भी और वहां भी, कि उसमें अंग्रेजों के प्रति नफरत का स्तर बिलकुल न्यूनतम स्तर पर था?

इस प्रकार से देखें तो हर साल किसी न किसी फिल्म के साथ कोई नई कहानी जुड़ी दिखाई देगी. यह तर्क गायब रहता है कि फलां फिल्म को चुनने के पीछे असल कारण क्या थे. क्या उसकी सत्यता, विश्वसनीयता और सटीकता जैसे कारण भी शामिल थे. गौर करने वाली बात है कि उपयुक्त फिल्म के अभाव के चलते साल 2003 में ऑस्कर के लिए कोई भी फिल्म नहीं भेजी गई, जबकि एक अरसे से पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में हमारे यहां बनती रही हैं.

हमें कैसे पता चलेगा कि तब यह निर्णय ठीक था, जबकि उस साल डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी निर्देशित ‘पिंजर’, राजू हिरानी की ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’, ‘कल हो ना हो’, ‘कोई मिल गया’, ‘बागबान’, ‘एलओसीः कारगिल’ सहित कुछ फिल्में थीं जो भेजी जा सकती थी. और मान भी लिया जाए कि तब वह निर्णय ठीक था, तो फिर साल 2007 में ‘एकलव्यः दि रॉयल गार्ड’, को किस आधार चुना गया जो न तो व्यावसायिक रूप से सफल थी और न ही समीक्षकों ने उसे सराहा था.

यह अंतिम सत्य तो नहीं

गोविंद निहलानी निर्देशित एवं ओम पुरी अभिनीत फिल्म ‘अर्द्ध सत्य’ (1983) के एक सीन का जिक्र अंत में महत्वपूर्ण लग रहा है. एक सीन में फिल्म का नायक इंस्पेक्टर अनंत वेलेंकर (ओम पुरी), नायिका ज्योत्सना (स्मिता पाटील) के सामने बैठकर अर्द्ध सत्य नामक कविता बड़ी ही उत्सुकता से पढ़ना शुरू करता है. जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता है, उसके मन के भाव, चेहरे पर नए चिह्नों को प्रदर्शित करने लगते हैं. कविता के अंत होने तक वह एक निढाल आत्मा की तरह ज्योत्सना के सामने होता है, जिसमें चेतना और डर दोनों है.

एक अन्य सीन में अनंत, ज्योत्सना को अपनी नौकरी के बारे में बताना चाहता है कि उसे वहां कैसा लगता है. वह अपने जीवन के सच को उसके सामने रखना चाहता है, जिसमें घुटन है, पछतावा है, निराशा है. ऐसा करते समय नैनों से उसकी कुंठा बहने के बजाए बस लाल होकर वहीं रह जाती है. कुर्सी पर सामने बैठी ज्योत्सना से वह नजरें नहीं मिला पाता. टेबल पर अपना हाथ सरकाते हुए ज्योत्सना उसे छूना चाहती है, पर हाथ बढ़ाकर पीछे सरका लेती है. फिल्म दिखाती है कि अस्सी के उस दौर में पुलिसिंग को लेकर किस तरह का माहौल रहा होगा.

एक दस्तावेज के रूप में ‘अर्द्ध सत्य’ का जिक्र कई बातों में किया जा सकता है, जो शायद इस मंशा से बनाई भी न गई हो कि विषय के प्रति अपनी सटीकता एवं सत्यता के मद्देनजर फिल्म को भविष्य में सहेजकर रखा जाएगा. निर्देशक के जेहन में एक पुलिसवाला और उसकी छवि के आस-पास सिमटा अर्ध सत्य, ही संभवतः केन्द्र में रहें होंगे. इसलिए एक नहीं कई कारणों से इस फिल्म की आज भी बात होती है. क्या अजीब संयोग है कि सन् 1980 में आई सत्येन बोस की फिल्म ‘पायल की झंकार’, को 53वें ऑस्कर के लिए भेजे जाने के लगातार तीन वर्षों तक किसी भी फिल्म को प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं भेजा गया था. इस अंतराल के बाद सन 1984 में आयी महेश भट्ट निर्देशित ‘सारांश’ को 57वें ऑस्कर के लिए भेजा गया. अर्द्ध सत्य की तरह शायद और भी कई फिल्में होंगी, जो ऑस्कर भेजी तो जा सकती थीं पर?

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