High Court Made Strong Remarks On The Functioning Of Secretary Personnel And Director General Of Police – Himachal: सचिव कार्मिक और पुलिस महानिदेशक की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट ने की कड़ी टिप्पणी

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– फोटो : अमर उजाला

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सचिव कार्मिक और पुलिस महानिदेशक ने याचिकाकर्ता को वित्तीय लाभ अदा नहीं किए। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने कहा कि इन्हें कानून का पर्याप्त ज्ञान है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अज्ञानता का ढोंग नहीं कर सकते हैं। इन्होंने याचिकाकर्ता को फिजूल में ही मुकदमेबाजी में घसीटने का व्यवहार किया है। अदालत ने सारे वित्तीय लाभ एक महीने के भीतर 9 फीसदी ब्याज के साथ अदा करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले की जांच कर ब्याज की राशि दोषी अधिकारी से वसूली जाए। अदालत ने अपने आदेशों की अनुपालना रिपोर्ट 30 दिसंबर तक तलब की है। 

गत 20 सितंबर को पारित निर्णय के तहत अदालत ने सुरक्षा रांटा को वर्ष 2009 से 2015 तक सारे वित्तीय लाभ का हकदार ठहराया था। ये लाभ 30 दिन के भीतर देने के आदेश दिए गए थे। अन्यथा 9 फीसदी ब्याज देने के स्पष्ट आदेश दिए गए थे। याचिकाकर्ता अमित की माता सुरक्षा रांटा वर्ष 2000 से कांस्टेबल के पद पर थीं। वर्ष 2002 में उसे हेड कांस्टेबल पदोन्नत किया गया था। वर्ष 2009 से एएसआई के पद पर पदोन्नत किया जाना था। उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने की वजह से उसे पदोन्नत नहीं किया गया। वर्ष 2015 में उसे आपराधिक मामले से बरी किया गया था। उसके बाद विभाग ने उसे वित्तीय लाभ से वंचित रखते हुए 2009 से पदोन्नत कर दिया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि विभाग का यह निर्णय गलत है। याचिकाकर्ता को वित्तीय लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता है। सामान्य नियम काम नहीं तो वेतन नहीं उस मामले में लागू नहीं होता, जहां कर्मचारी काम करने के इच्छुक है। हालांकि, उसे काम से दूर रखा जाता है।  

लोनिवि के इएनसी की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट ने की प्रतिकूल टिप्पणी 
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता की कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल टिप्पणी की है। स्पष्ट आदेशों के बावजूद अदालत में पेश न होने पर अदालत ने 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माने की यह राशि एक हफ्ते में अधिवक्ता फंड में जमा करवाने के आदेश दिए गए हैं। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने कहा कि यदि विभाग लंबित मामले में जवाब दायर नहीं करता है तो प्रधान सचिव और अधीक्षण अभियंता अदालत के समक्ष उपस्थित रहें। मामले की सुनवाई 11 नवंबर को निर्धारित की गई है।  नेपाली मूल की तारा देवी ने अदालत के समक्ष वर्ष 2020 में सेवा लाभ के लिए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी आठ साल की दैनिक भोगी सेवा को वित्तीय लाभ के लिए गिने जाने का आग्रह किया था। इस मामले को अदालत ने 21 जुलाई, 2020 को सुनवाई के लिए मंजूर किया था। 30 अक्तूबर, 2020 को अदालत ने विभाग को याचिका का जवाब दायर करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया था। दो वर्षों से अधिक समय बीत जाने पर भी विभाग इस मामले में जवाब दायर करने में असफल रहा है। जवाब दायर न करने पर अदालत ने विभाग के अधीक्षण अभियंता और पंजीयक को 28 अक्तूबर के लिए अदालत में तलब किया था। स्पष्ट आदेशों के बावजूद अधीक्षण अभियंता अदालत में न तो पेश हुए और न ही छूट देने के लिए कोई आवेदन किया गया। अदालत ने अधिकारियों की इस कार्यशैली को उदासीन और कठोर रवैया बताया है। 

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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत के स्पष्ट आदेशों के बावजूद सचिव कार्मिक और पुलिस महानिदेशक ने याचिकाकर्ता को वित्तीय लाभ अदा नहीं किए। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने कहा कि इन्हें कानून का पर्याप्त ज्ञान है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अज्ञानता का ढोंग नहीं कर सकते हैं। इन्होंने याचिकाकर्ता को फिजूल में ही मुकदमेबाजी में घसीटने का व्यवहार किया है। अदालत ने सारे वित्तीय लाभ एक महीने के भीतर 9 फीसदी ब्याज के साथ अदा करने के आदेश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले की जांच कर ब्याज की राशि दोषी अधिकारी से वसूली जाए। अदालत ने अपने आदेशों की अनुपालना रिपोर्ट 30 दिसंबर तक तलब की है। 

गत 20 सितंबर को पारित निर्णय के तहत अदालत ने सुरक्षा रांटा को वर्ष 2009 से 2015 तक सारे वित्तीय लाभ का हकदार ठहराया था। ये लाभ 30 दिन के भीतर देने के आदेश दिए गए थे। अन्यथा 9 फीसदी ब्याज देने के स्पष्ट आदेश दिए गए थे। याचिकाकर्ता अमित की माता सुरक्षा रांटा वर्ष 2000 से कांस्टेबल के पद पर थीं। वर्ष 2002 में उसे हेड कांस्टेबल पदोन्नत किया गया था। वर्ष 2009 से एएसआई के पद पर पदोन्नत किया जाना था। उसके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने की वजह से उसे पदोन्नत नहीं किया गया। वर्ष 2015 में उसे आपराधिक मामले से बरी किया गया था। उसके बाद विभाग ने उसे वित्तीय लाभ से वंचित रखते हुए 2009 से पदोन्नत कर दिया। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि विभाग का यह निर्णय गलत है। याचिकाकर्ता को वित्तीय लाभ से वंचित नहीं रखा जा सकता है। सामान्य नियम काम नहीं तो वेतन नहीं उस मामले में लागू नहीं होता, जहां कर्मचारी काम करने के इच्छुक है। हालांकि, उसे काम से दूर रखा जाता है।  

लोनिवि के इएनसी की कार्यप्रणाली पर हाईकोर्ट ने की प्रतिकूल टिप्पणी 

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने लोक निर्माण विभाग के अधीक्षण अभियंता की कार्यप्रणाली पर प्रतिकूल टिप्पणी की है। स्पष्ट आदेशों के बावजूद अदालत में पेश न होने पर अदालत ने 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। जुर्माने की यह राशि एक हफ्ते में अधिवक्ता फंड में जमा करवाने के आदेश दिए गए हैं। न्यायाधीश संदीप शर्मा ने कहा कि यदि विभाग लंबित मामले में जवाब दायर नहीं करता है तो प्रधान सचिव और अधीक्षण अभियंता अदालत के समक्ष उपस्थित रहें। मामले की सुनवाई 11 नवंबर को निर्धारित की गई है।  नेपाली मूल की तारा देवी ने अदालत के समक्ष वर्ष 2020 में सेवा लाभ के लिए याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने अपनी आठ साल की दैनिक भोगी सेवा को वित्तीय लाभ के लिए गिने जाने का आग्रह किया था। इस मामले को अदालत ने 21 जुलाई, 2020 को सुनवाई के लिए मंजूर किया था। 30 अक्तूबर, 2020 को अदालत ने विभाग को याचिका का जवाब दायर करने के लिए चार हफ्ते का समय दिया था। दो वर्षों से अधिक समय बीत जाने पर भी विभाग इस मामले में जवाब दायर करने में असफल रहा है। जवाब दायर न करने पर अदालत ने विभाग के अधीक्षण अभियंता और पंजीयक को 28 अक्तूबर के लिए अदालत में तलब किया था। स्पष्ट आदेशों के बावजूद अधीक्षण अभियंता अदालत में न तो पेश हुए और न ही छूट देने के लिए कोई आवेदन किया गया। अदालत ने अधिकारियों की इस कार्यशैली को उदासीन और कठोर रवैया बताया है। 

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