Chamurthi Horse In International Lavi Fair 2022 Rampur Bushahar – रामपुर बुशहर: दो साल बाद लवी में होगा पहाड़ों के जहाज चामुर्थी घोड़े का कारोबार

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चामुर्थी घोड़े

चामुर्थी घोड़े
– फोटो : संवाद

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दो साल बाद अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में पहाड़ का जहाज कहे जाने वाले चामुर्थी घोड़ों का कारोबार होगा। कोरोना के कारण पिछले दो साल से मेला सूक्ष्म रूप से मनाया गया। ऐसे में इन घोड़ों का कारोबार नहीं हुआ। इस बार लवी मेला मैदान में चार से छह नवंबर तक अश्व प्रदर्शनी लगेगी। इसमें चामुर्थी घोड़ों की खरीद फरोख्त होगी। 

ऊपरी हिमाचल में जब सड़कों का अभाव था तो घोड़े और खच्चर ही आवाजाही और सामान ढोने का एकमात्र साधन थे। करीब 300 साल का इतिहास समेटे रामपुर के ऐतिहासिक लवी मेले में सदियों से घोड़े और भेड़-बकरियों की खरीद फरोख्त हो रही है। शुरुआती दौर में भारत के विभिन्न राज्यों और अफगानिस्तान से घोड़ों के शौकीन मेले में पहुंचते थे।

तिब्बत, लाहौल-स्पीत और किन्नौर जिले से पशुपालक हर वर्ष यहां घोड़े और अन्य जानवर लेकर पहुंचते थे। समय के साथ साथ दौर बदला और अब उत्तराखंड और अन्य पहाड़ी राज्यों के खरीदार ही यहां घोड़ों की खरीद फरोख्त के लिए पहुंचते हैं। इस साल चार से छह नवंबर तक मेला मैदान में पहुंचने वाले घोड़ों के पंजीकरण की प्रक्रिया चलेगी।

यहां पहुंचने वाले घोड़ों के उपचार और चारे की उपलब्धता पशु पालन विभाग करेगा। इसके अलावा चार नवंबर को विभाग की ओर से स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता करवाई जाएगी।

पांच को किसान गोष्ठी, जबकि छह नवंबर को बेहतरीन घोड़े का चयन और घोड़ों की 400 और 800 मीटर की दौड़ प्रतियोगिता करवाई जाएगी। पशु पालन विभाग के डॉ. सुरेश कपूर ने बताया कि  चार से छह नवंबर तक अश्व प्रदर्शनी लगेगी।

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दो साल बाद अंतरराष्ट्रीय लवी मेले में पहाड़ का जहाज कहे जाने वाले चामुर्थी घोड़ों का कारोबार होगा। कोरोना के कारण पिछले दो साल से मेला सूक्ष्म रूप से मनाया गया। ऐसे में इन घोड़ों का कारोबार नहीं हुआ। इस बार लवी मेला मैदान में चार से छह नवंबर तक अश्व प्रदर्शनी लगेगी। इसमें चामुर्थी घोड़ों की खरीद फरोख्त होगी। 

ऊपरी हिमाचल में जब सड़कों का अभाव था तो घोड़े और खच्चर ही आवाजाही और सामान ढोने का एकमात्र साधन थे। करीब 300 साल का इतिहास समेटे रामपुर के ऐतिहासिक लवी मेले में सदियों से घोड़े और भेड़-बकरियों की खरीद फरोख्त हो रही है। शुरुआती दौर में भारत के विभिन्न राज्यों और अफगानिस्तान से घोड़ों के शौकीन मेले में पहुंचते थे।

तिब्बत, लाहौल-स्पीत और किन्नौर जिले से पशुपालक हर वर्ष यहां घोड़े और अन्य जानवर लेकर पहुंचते थे। समय के साथ साथ दौर बदला और अब उत्तराखंड और अन्य पहाड़ी राज्यों के खरीदार ही यहां घोड़ों की खरीद फरोख्त के लिए पहुंचते हैं। इस साल चार से छह नवंबर तक मेला मैदान में पहुंचने वाले घोड़ों के पंजीकरण की प्रक्रिया चलेगी।

यहां पहुंचने वाले घोड़ों के उपचार और चारे की उपलब्धता पशु पालन विभाग करेगा। इसके अलावा चार नवंबर को विभाग की ओर से स्कूली बच्चों के लिए चित्रकला प्रतियोगिता करवाई जाएगी।

पांच को किसान गोष्ठी, जबकि छह नवंबर को बेहतरीन घोड़े का चयन और घोड़ों की 400 और 800 मीटर की दौड़ प्रतियोगिता करवाई जाएगी। पशु पालन विभाग के डॉ. सुरेश कपूर ने बताया कि  चार से छह नवंबर तक अश्व प्रदर्शनी लगेगी।

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