जानिए चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों का क्या फल होता है? | Know what is the result of variable, fixed and dual nature

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नई दिल्ली, 22 अगस्त। जातक के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में गोचर कर रहा होता है वही राशि जातक की होती है। राशियां तीन प्रकार की होती हैं- चर, स्थिर और द्विस्वभाव। पहली से बारहवीं राशि तक क्रमश: चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियां होती हैं। इस प्रकार मेष, कर्क, तुला और मकर चर राशियां होती हैं। वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ स्थिर राशियां होती हैं। मिथुन, कन्या, धनु और मीन द्विस्वभाव राशियां होती हैं। राशियों के इन तीन स्वभावों के कारण इनमें जन्म लेने वाले का भाग्य और स्वभाव भी उसी के अनुरूप होता है।

जानिए चर, स्थिर और द्विस्वभाव राशियों का क्या फल होता है

आइए जानते हैं तीनों प्रकार की राशियों में जन्म लेने वाले जातकों के बारे में…

  • चर राशियां- मेष, कर्क, तुला और मकर राशि में जन्म लेने वाले जातकों को जो भी मिलता है वह स्थायी नहीं होता। इन्हें क्षणिक ऐश्वर्य मिलता है, किसी से मित्रता होती है तो वह भी क्षणिक होती है। ये चंचल प्रकार के होते हैं। भ्रमणशील होते हैं और सदैव अपनी प्रतिज्ञा से, अपनी कही हुई बात से विमुख रहते हैं।

क्या होते हैं मुहूर्त, 24 घंटे में 30 मुहूर्तो का क्या है महत्व?क्या होते हैं मुहूर्त, 24 घंटे में 30 मुहूर्तो का क्या है महत्व?

  • स्थिर राशियां- वृषभ, सिंह, वृश्चिक और कुंभ राशि में जन्म लेने वाले जातकों का भाग्य और स्वभाव चर राशि के जातकों के ठीक विपरीत होता है। अर्थात् इनके पास अचल संपत्ति रहती है, इनकी मित्रता भी स्थायी रहती है। स्वभाव स्थिर होता है और ये हमेशा अपने नियमों पर चलते हैं। क्षमाशील होते हैं एवं दीर्घसूत्री कार्य लेकर चलने वाले होते हैं।
  • द्विस्वभाव राशियां- मिथुन, कन्या, धनु और मीन राशि में जन्म लेने वाले जातक दानी और उत्साही किस्म के होते हैं। इनमें भी यदि द्विपद राशि जैसे मिथुन-कन्या में जन्म हो तो जातक को ग्रामीण जीवनयापन करना पसंद होता है। चतुष्पद राशिगत अर्थात् धनु का चंद्रमा हो तो जातक जंगली जीवन बिताने वाला होता है। जलचरस्थ राशिगत अर्थात् मीन राशि का चंद्रमा हो तो जातक जलप्रिय होता है।

English summary

Know what is the result of variable, fixed and dual nature. read details.

Story first published: Monday, August 22, 2022, 7:00 [IST]

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Palmistry: हस्तरेखा बताती है प्रशासनिक सेवा में जाने का योग | Palmistry: Can a palm tells the sum of going to administrative service

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नई दिल्ली, 21 अगस्त। जन्मकुंडली की तरह हस्तरेखा में भी करियर के बारे में सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है। हस्तरेखा में बुध, सूर्य और गुरु की रेखाओं और पर्वतों से प्रशासनिक अधिकारी बनने का योग देखा जा सकता है।

Palmistry: हस्तरेखा बताती है प्रशासनिक सेवा में जाने का योग

आइए जानते हैं कुछ रेखाओं-पर्वतों और चिह्नों के संयोग…

  • जिस जातक के हाथ में बुध की अंगुली अर्थात् कनिष्ठिका अंगुली पूर्ण लंबाई लिए हुए हो और उसका अंतिम सिरा अनामिका अंगुली के तीसरे पोर से आगे अर्थात् आधे से अधिक भाग तक पहुंच चुका हो, इसके साथ ही सूर्य रेखा अत्यंत उच्च कोटि की हो तो वह व्यक्ति आइएएस अधिकारी होता है और आगे चलकर देश के अत्यंत बड़े प्रशासनिक पद पर आसीन होता है।
  • जिस जातक के हाथ में बुध की अंगुली अर्थात् कनिष्ठिका अंगुली पूर्ण लंबाई लिए हुए हो और उसका अंतिम सिरा अनामिका अंगुली के तीसरे पोर से आगे अर्थात् आधे से अधिक भाग तक पहुंच चुका हो, लेकिन सूर्य रेखा कमजोर या कटी-फटी हो तो जातक मात्र आइएएस अधिकारी होकर रह जाता है, आगे उन्नति नहीं होती है।

क्या होते हैं मुहूर्त, 24 घंटे में 30 मुहूर्तो का क्या है महत्व?क्या होते हैं मुहूर्त, 24 घंटे में 30 मुहूर्तो का क्या है महत्व?

  • यदि कनिष्ठिका अंगुली लंबी हो, सूर्य रेखा भी अपने आप में पुष्ट हो तथा मस्तिष्क रेखा पूर्ण विकसित हो और उसके साथ ही भाग्य रेखा लंबी, निर्दोष तथा पूर्ण हो तो वह व्यक्ति केंद्रीय सरकार में उच्च पदस्थ अधिकारी होता है।
  • भाग्य रेखा तथा गुरु पर्वत बहुत अधिक उन्नत हो, श्रेष्ठ हो तो वह व्यक्ति निश्चित रूप से केंद्रीय सेवा में सेक्रेटरी या अत्यंत उच्च पदस्थ व्यक्ति होता है। ऐसे व्यक्ति के कार्यो का प्रशासन पर पूर्ण प्रभाव रहता है।
  • यदि सूर्य रेखा पर निर्दोष त्रिकोण बना हो तथा सभी अंगुलियां अपने आप में पूर्ण लंबाई लिए हुए हों तो ऐसा व्यक्ति निश्चित ही देश का बड़ा प्रशासनिक अधिकारी बनता है। ऐसा व्यक्ति सेनाध्यक्ष भी बन सकता है।
  • सूर्य रेखा अत्यंत पुष्ट हो तथा बुध पर्वत गोल, चिकना, उभरा हुआ हो साथ ही मंगल पर्वत भी पुष्ट हो तो जातक पुलिस का बड़ा अधिकारी बनता है।

English summary

Can a palm tells the sum of going to administrative service? , what says Palmistry about this? read details here.

Story first published: Sunday, August 21, 2022, 7:00 [IST]

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क्या होते हैं मुहूर्त, 24 घंटे में 30 मुहूर्तो का क्या है महत्व? | What are the Muhurtas, what is the importance of 30 Muhurtas in 24 hours

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नई दिल्ली, 19 अगस्त। वैदिक काल से भारतीय परंपरा में मुहूर्तो का बड़ा महत्व बताया गया है। प्रत्येक कार्य को करने के लिए शुभ मुहूर्त का विचार अवश्य किया जाता है। वास्तव में मुहूर्त समय मापने की एक प्राचीन इकाई है। सूर्योदय से सूर्योदय तक अर्थात् 24 घंटे में 30 मुहूर्त होते हैं। 15 मुहूर्त दिन में और 15 मुहूर्त रात्रि में होते हैं। एक मुहूर्त दो घड़ी अर्थात् लगभग 48 मिनट का होता है। इन 30 मुहूर्तो में कुछ शुभ तो कुछ अशुभ होते हैं। इसलिए कार्यो की सिद्धि और सफलता के लिए शुभ मुहूर्तो का विचार किया जाता है। आइए जानते हैं 30 मुहूर्तो के नाम, शुभ-अशुभ और इनका समय।

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मंगल को करें प्रसन्न, शीघ्र बन जाएगा स्वयं का मकान, खरीद लेंगे भूमि | Make Mars happy, soon you will have your own house, will buy land

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नई दिल्ली, 19 अगस्त। अनेक लोगों का पूरा जीवन किराये के मकान में बीत जाता है। वे अपना एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा खरीदने के लिए जीवनभर कड़ा परिश्रम करते रहते हैं। किंतु फिर भी स्वयं का मकान नहीं बना पाते हैं। वैदिक ज्योतिष में मंगल भूमि, भवन, संपत्ति का कारक ग्रह होता है। यदि किसी जातक की जन्मकुंडली में मंगल शुभ है तो मनुष्य अनेक भूमि, भवनों का मालिक होता है और यदि मंगल खराब है तो जीवनभर परिश्रम करने के बाद भी मनुष्य अपने मकान के लिए भटकता रहता है।

मंगल को करें प्रसन्न, शीघ्र बन जाएगा स्वयं का मकान

यदि आप भी स्वयं के भूमि, भवन का मालिक बनना चाहते हैं तो अपनी जन्मकुंडली में मंगल की स्थिति देखकर यदि वह कमजोर है तो उसे मजबूत बनाने के उपाय करना चाहिए। जन्मकुंडली में चौथा स्थान भौतिक सुख-सुविधाओं का स्थान होता है। यदि चतुर्थ भाव का स्वामी मजबूत है और मंगल भी उच्च का हो, स्वगृही हो, मूल त्रिकोणस्थ हो तथा शुभ स्थान में हो तो शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

Manas Pooja: मानस पूजा से मिलता है हजार गुना अधिक फलManas Pooja: मानस पूजा से मिलता है हजार गुना अधिक फल

मंगल को मजबूत करने के उपाय

  • मंगल को मजबूत करने के लिए सबसे पहले आपको अपने घर में मंगल यंत्र की स्थापना करनी चाहिए। तांबे या अष्टधातु से बने मंगल यंत्र को मंगलवार के दिन विधिवत पूजन कर लाल वस्त्र पर या लाल चंदन की चौकी पर स्थापित करें। नित्य इसका दर्शन पूजन करें और इस पर लाल चंदन की नौ बिंदियां लगाएं।
  • नित्य प्रतिदिन स्वयं भी लाल चंदन या केसर का तिलक अपने मस्तक पर लगाएं। नाभि पर केसर की बिंदी नित्य लगाएं।
  • लाल मूंगे से बने गणेशजी की मूर्ति घर में स्थापित करें या मूंगे के गणेशजी का पेंडेंट गले में धारण करें।
  • मंगल स्तोत्र का नित्य पाठ करने से मंगल शुभ होगा और भूमि भवन के कार्य शीघ्र होंगे।
  • प्रत्येक मंगलवार के दिन भगवान शिव का अभिषेक केसरयुक्त दूध से करें। लाल चंदन का त्रिपुंड लगाएं।
  • चीटियों को गुड़ से बनी रोटी प्रत्येक मंगलवार को खिलाएं।

English summary

Make Mars happy, soon you will have your own house, will buy land. here is details.

Story first published: Friday, August 19, 2022, 6:50 [IST]

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शास्त्रों में वर्णित हैं शरीर पर तेल लगाने के नियम, गलत दिन लगाने से होती है हानि | The rules for applying oil on the body are described in the scriptures, Read Details here

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नई दिल्ली, 18 अगस्त। प्राचीनकाल में स्नान से पूर्व शरीर पर तेल की मालिश करने का नियम था। इससे शरीर को रोगमुक्त और ऊर्जावान बनाए रखने में सहायता मिलती थी। आजकल जिन घरों में पुराने समय की दादी-नानियां हैं वहां आज भी इस परंपरा का पालन किया जाता है किंतु आधुनिक घरों में यह परंपरा अब लुप्त हो गई है। इनके स्थान पर हाई क्लास मसाज सेंटर खुल गए हैं, जहां लोग अपने आप को स्फूर्तिवान बनाए रखने के लिए मालिश करवाने पहुंचते हैं। यह हाई क्लास सोसायटी में शामिल हो गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं प्राचीनकाल में शास्त्रों में तेल मालिश को शारीरिक स्वस्थता के साथ धर्म, संस्कृति, यश-अपयश आदि से भी जोड़ा गया है।

शास्त्रों में वर्णित हैं शरीर पर तेल लगाने के नियम, गलत दिन लगाने से होती है हानि

प्राचीनकाल में शरीर पर तैल लगाने के लिए दिन, तिथियां, वार आदि सभी निर्धारित किए गए थे। कई घरों में अभी भी इनका पालन किया जाता है। इसे तैलाभ्यंग कहा जाता है।

आइए जानते हैं क्या हैं वे नियम

निर्णयसिंधु का कथन है किषष्ठी, एकादशी, द्वादशी, अमावस्या, पूर्णिमा, व्रत एवं श्राद्ध के दिन तैलाभ्यंग नहीं करना चाहिए। रविवार, मंगलवार, गुरुवार और शुक्रवार को शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहिए। किंतु सुगंधित पुष्पों से वासित, आयुर्वेद की पद्धति से सिद्ध षड्विंदु और महाभृंगराज आदि सुगंधित तेल को वर्जित काल में भी लगाया जा सकता है। इसी प्रकार सरसों के तेल का भी निषेध नहीं है। मुख्य रूप से तिल के तेल का ही निषेध शास्त्रों में बताया गया है।

किस दिन का क्या प्रभाव

निर्णयसिंधु का कथन है किरविवार को तेल लगाने से ताप अर्थात् बुखार आता है। सोमवार को शोभा बढ़ती है। मंगलवार को मृत्यु के समान कष्ट होता है, बुधवार को तेल लगाने से धन प्राप्ति होती है, गुरुवार को हानि होती है, शुक्रवार को दुख और शनिवार को शरीर पर तेल लगाने से सुखों की प्राप्ति होती है।

Janmashtami 2022: 18 या 19 कब है जन्माष्टमी? क्या है शुभ मुहूर्त? इन 5 चीजों से करें लड्डू गोपाल को पसंदJanmashtami 2022: 18 या 19 कब है जन्माष्टमी? क्या है शुभ मुहूर्त? इन 5 चीजों से करें लड्डू गोपाल को पसंद

परिहार क्या

यदि निषिद्ध वारों में तेल लगाना हो तो रविवार को पुष्प, मंगलवार को मिट्टी, गुरुवार को दूर्वा और शुक्रवार को तेल में गोबर डालकर लगाने से दोष नहीं लगता। गंधयुक्त पुष्पों से सुवासित, अन्य पदार्थो से युक्त तथा सरसों का तेल दूषित नहीं होता है।

English summary

Astrology says that the oil should not be used on Friday, The rules for applying oil on the body are described in the scriptures, read details here.

Story first published: Thursday, August 18, 2022, 7:00 [IST]

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Krishna Janmashtami 2022: गर्भ की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर बनाएं गर्भरक्षक श्रीवासुदेव सूत्र | Krishna Janmashtami 2022: Garbh Rakshak Shrivasudev Sutra is good for Child

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नई दिल्ली, 17 अगस्त। दीर्घायु और निरोगी उत्तम संतान की प्राप्ति प्रत्येक दंपती का लक्ष्य होता है किंतु कई स्ति्रयों को संतान प्राप्ति में कठिनाई आती है। उनका गर्भ या तो ठहरता ही नहीं, या कुछ ही सप्ताह में गर्भपात हो जाता है या जन्म लेने के बाद संतान की शीघ्र मृत्यु हो जाती है। यह बड़ा कठिन और पीड़ादायक होता है। ऐसी स्थिति में गर्भ की रक्षा के लिए श्रीमद्भागवत में भगवान कृष्णद्वैपायन व्यास ने एक अमोघ और चमत्कारिक उपाय बताया है। यह उपाय है गर्भरक्षक श्रीवासुदेव सूत्र। यह एक प्रकार का सूत्र होता है जिस मंत्रों से अभिमंत्रित करके महिला को बांधा जाता है, जिससे गर्भ की रक्षा होती है। भगवान श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ की रक्षा के लिए इसी सूत्र का प्रतिपादन किया था। वैसे तो यह सूत्र किसी भी समय किसी भी काल में बनाया जा सकता है किंतु श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का दिन सर्वथा उपयुक्त है।

यह है मंत्र

अन्त:स्थ: सर्वभूतानामात्मा योगेश्वरो हरि: ।
स्वमाययावृणोद् र्गभ वैराट्या: कुरुतन्तवे ।।

अर्थात्- समस्त प्राणियों के हृदय में आत्मा रूप से स्थित योगेश्वर श्रीहरि ने कुरुवंश की वृद्धि के लिए उत्तरा के गर्भ को अपनी माया के कवच से ढक दिया।

मंत्र का प्रभाव

उपरोक्त मंत्र उन कुलवधुओं के लिए चमत्कारिक रूप से काम करता है जिन्हें गर्भ तो रहता है किंतु पूर्ण प्रसव नहीं हो पाता, बीच में ही खंडित हो जाता है। यह उन महिलाओं के लिए भी कल्पवृक्ष के समान फलदाता है जिनको बच्चा सर्वागपूर्ण पैदा होता है किंतु जीवित नहीं रहता। इस महामंत्र का गर्भस्थ शिशु के मन पर भी बड़ा चमत्कारिक प्रभाव पड़ता है। उसके संस्कार बदल जाते हैं और वह बुरी शक्तियों, बुरी नजरों, रोगादि से सुरक्षित रहता है। इस महामंत्र के प्रभाव से सर्वशक्तिमान भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य आयुध उस महिला के गर्भ की रक्षा करते हैं, जो श्रद्धापूर्वक श्रीवासुदेव सूत्र को धारण करती है। यह सूत्र बड़ा ही उग्र, साक्षात फलदाता है।

कैसे बनाएं गर्भरक्षक श्रीवासुदेव सूत्र

  • यह गर्भरक्षक सूत्र जिस सौभाग्वयती स्त्री के लिए बनाना हो उसके और सूत्र बनाने वाले के चित्त अत्यंत शुद्ध और पवित्र होने चाहिए। दोनों के मन में रक्षा सूत्र के प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास होना चाहिए। जिस महिला के लिए सूत्र बनाना हो उसे स्नानादि के बाद शुद्ध वस्त्र पहनाकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणोदक और तुलसीदल की प्रसादी दें।
  • इसके बाद श्रीगणेश-गौरी का पूजन और नवग्रहों की यथाशक्ति शांति कराकर पूर्वाभिमुख खड़ी कर दें। अब एक केसरिया रंग का रेशम का डोरा लें। रेशम के डोरे को मस्तक से पैर तक सात बार नाप लें। डोरा इतना लंबा हो किबीच में गांठ न बांधना पड़े। इसके बाद ऊपर दिए मंत्र के आदि में ऊं तथा अंत में स्वाहा बोलकर 21 बार जप करके माला की गांठ की भांति गांठ लगाते जाएं। इस प्रकार 21 गांठ लगाकर सूत्र की विधिवत वैष्णव मंत्रों से प्राण प्रतिष्ठा और पूजन करें।
  • इसके बाद शुभ समय में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए गर्भिणी और गर्भ की रक्षा की प्रार्थनाकर उस डोरे को वामहस्तमूल, गले अथवा अत्यंत पीड़ा के समय नाभि के नीचे कमर में बांध दें।
  • यदि इस वासुदेव सूत्र का निर्माण और बंधन विधिवत हो गया तो गर्भ कभी नष्ट नहीं हो सकता। रेशम के डोरे के स्थान पर कुंवारी कन्या के द्वारा काता केसरिया रंग में रंगा कच्चा सूत भी ले सकते हैं। किंतु यह सूत अत्यंत महीन होता है। इसके टूटने का डर होता है। यदि सूत ले रहे हैं तो अत्यंत सावधानी रखनी होती है।

Hal Shashthi Vrat 2022 or Balaram Jayanti: 'हलछठ' व्रत आज, जानिए शुभ मुहूर्तHal Shashthi Vrat 2022 or Balaram Jayanti: ‘हलछठ’ व्रत आज, जानिए शुभ मुहूर्त

इन नियमों का पालन करना होगा

  • गर्भरक्षक सूत्र बांधने के बाद स्त्री को कुछ नियमों का पालन करना आवश्यक है। सूत्र को बांधकर उस घर में न जाएं जहां किसी का जन्म हुआ है या किसी का मरण हुआ है।
  • सूत्र को प्रतिदिन भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए सुगंधित धूप से सुवासित करते रहना चाहिए।
  • प्रसव का समय सकुशल प्राप्त होने पर सूत्र को कमर से खोलकर बाहुमूल में या गले में बांध देना चाहिए।
  • बच्चे का नाल छेदन और स्नान हो जाने के बाद सूत्र को धूप देकर बच्चे के गले में पहना दें।
  • सवा महीने के बाद बच्चे के लिए नए सूत्र का निर्माण कराकर बांध दें।
  • पुराने सूत्र का आभार मानते हुए भगवन्नाम का कीर्तन करते हुए किसी पवित्र नदी, सरोवर में विसर्जित कर दें।
  • शुद्ध हृदय से स्त्री को नित्य श्रीकृष्ण के नाम का उच्चारण करते रहना चाहिए।
  • श्रीवासुदेव सूत्र गर्भपीड़ित महिलाओं का कष्ट हरता है। यह एक अक्षय वैष्णव कवच है।

English summary

Krishna Janmashtami 2022 is coming on 18th- 19th August. here is Garbh Rakshak Shrivasudev Sutra. its good for Child.

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शिव योग, नाग करण में बना शनैश्चरी अमावस्या का योग, पितृ कार्यो के लिए सिद्ध है यह अमावस्या | Amavasya in August 2022 dates, time, shubh muhurat rituals and significance benefits

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संवत 2079 भाद्रपद मास की अमावस्या 27 अगस्त 2022 शनिवार को आ रही है। शनिवार के दिन आने के कारण शनैश्चरी अमावस्या का योग तो बना ही है इसके साथ ही इस दिन शिव योग और नाग करण भी है। शनैश्चरी अमावस्या के दिन शिव योग और नाग करण रहने से यह अमावस्या शनि की पीड़ा से मुक्ति दिलाने वाली तो है ही, कुंडली के पितृ दोष, नाग दोष, ग्रहण दोष, विष योग आदि से भी मुक्ति दिलाने वाली है।

Amavasya

अमावस्या तिथि 26 अगस्त को दोपहर 12.26 बजे से प्रारंभ होकर 27 अगस्त को दोपहर 1.48 बजे तक रहेगी। चूंकिअमावस्या के पुण्यकाल में स्नान-दान आदि किए जाते हैं इसलिए पुण्यकाल 27 अगस्त को सूर्योदय के समय से प्रारंभ होकर दिवसर्पयत रहेगा। 27 अगस्त को शिव योग सूर्योदय से रात्रि 2 बजकर 5 मिनट तक रहेगा अर्थात् पूरे दिन शिव योग का सान्निध्य प्राप्त रहेगा। इसके साथ ही नाग करण अमावस्या तिथि की समाप्ति तक अर्थात् दोपहर 1.48 बजे तक रहेगा। इस प्रकार अमावस्या के पुण्यकाल में शनैश्चरी के साथ शिव योग और नाग करण की साक्षी रहेगी।

इस अमावस्या को सिद्ध पितृ अमावस्या भी कहा गया है। इतने विशिष्ट योग में आ रही शनैश्चरी अमावस्या के दिन अपने जीवन के संकटों का समाधान करने के लिए कुछ विशेष उपाय करने चाहिए।

इस दिन कुछ विशेष उपाय करने से सुख-समृद्धि बनी रहेगी

– शनि की साढ़ेसाती और ढैया अनेक प्रकार के कष्ट उत्पन्न करते हैं। इसलिए साढ़ेसाती और ढैया वाले जातक शनि की शांति के लिए शनैश्चरी अमावस्या के दिन ऊं शं शनैश्चराय मंत्र का जाप लावा स्टोन से बनी माला से करते हुए शनिदेव का तिल के तेल से अभिषेक करें। ऐसी 11 या 21 माला जाप करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है और साढ़ेसाती कष्टप्रद नहीं रह जाती।

– जन्मकुंडली में शनि-चंद्र की युति से विष योग बनता है। विष योग वाले जातक जीवनभर धोखाधड़ी के शिकार होते हैं। इन्हें हर जगह मात्र कष्ट ही मिलते हैं। जहरीले जीव जंतुओं से इन्हें सदैव हानि होती रहती है और ये अक्सर फूड पायजन या जहरीली वस्तुओं के शिकार हो जाते हैं। इनसे रक्षा के लिए शनैश्चरी अमावस्या के दिन भगवान शिव का पंचामृत अभिषेक करके नाग पूजा संपन्न करें। किसी सपेरे से सांप लेकर उसे जंगल में मुक्त करवाएं। पंचमुखी रुद्राक्ष धारण करें।

– यह अमावस्या पितृ कार्यो के लिए श्रेष्ठ है। यदि आपकी कुंडली में पितृदोष है तो इस अमावस्या के दिन किसी पंडित को घर बुलाकर या किसी पवित्र नदी के तट पर बैठकर पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान आदि कर्म करें।

– आर्थिक परेशानियां दूर करने के लिए शनैश्चरी अमावस्या के दिन प्रात:काल पीपल के पेड़ की 108 परिक्रमा करते हुए उसके तने पर कच्चा सूत लपेटें। उसी के नीचे बैठकर विष्णुसहस्रनाम का पाठ करें। शाम के समय जौ के आटे के पांच दीपक बनाएं उनमें तिल का तेल भरें और पीपल के पेड़ के नीचे सूर्यास्त के बाद प्रज्वलित करें। इससे शीघ्र ही धन का आगमन होने लगता है।

<strong>ये भी पढ़ें- Janmashtami 2022: उत्तम संतान और सुख-समृद्धि देता है जन्माष्टमी व्रत</strong>ये भी पढ़ें- Janmashtami 2022: उत्तम संतान और सुख-समृद्धि देता है जन्माष्टमी व्रत

– इस दिन पितरों की संतुष्टि के निमित्त श्राद्ध आदि करके ब्राह्मणों को भोजन करवाएं और उचित दान-दक्षिणा देकर आशीर्वाद प्राप्त करें। गायों को हरा चारा खिलाएं, पक्षियों के लिए दाना रखें, गरीबों को खाने की वस्तुएं दान करें।

English summary

Amavasya in August 2022 dates, time, shubh muhurat rituals and significance benefits

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मास शिवरात्रि के दिन बना गुरु पुष्य संयोग, अघोरा चतुर्दशी भी इसी दिन | Masik Shivaratri 2022: Know date shubh muhurat puja vidhi

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भाद्रपद की मास शिवरात्रि 25 अगस्त 2022 गुरुवार को आ रही है। इस दिन पुष्य नक्षत्र होने से गुरु पुष्य का शुभ संयोग बना है। इसी दिन भगवान शिव के एक स्वरूप को समर्पित अघोरा चतुर्दशी भी है। इस दिन भगवान शिव का पूजन, अभिषेक करने से जीवन की परेशानियों का अंत होता है और कष्टों से मुक्ति मिलती है। आयु और आरोग्य में वृद्धि होती है।

shivratri

चतुर्दशी का पंचांग

25 अगस्त को प्रात: 10 बजकर 40 मिनट से चतुर्दशी तिथि प्रारंभ होगी जो 26 अगस्त को दोपहर 12 बजकर 26 मिनट तक रहेगी। 25 अगस्त को पुष्य नक्षत्र सूर्योदय से सायं 4 बजकर 16 मिनट तक रहेगा। इस प्रकार गुरु पुष्य का संयोग प्रात: 6.11 से सायं 4.16 बजे तक मिलेगा। कुल 10 घंटे 5 मिनट का गुरु पुष्य का संयोग मिलेगा।

क्या करें गुरु पुष्य संयोग में

– मास शिवरात्रि के दिन भगवान शिव का पूजन अभिषेक ठीक उसी तरह किया जाता है जैसा महाशिवरात्रि के दिन किया जाता है। भगवान शिव का अभिषेक करें, पूजन करें, बेल पत्र, धतूरा, आंकड़े के फूल अर्पित करें। शिव महिम्नस्तोत्र का पाठ करें।

– शिवरात्रि भगवान शिव-पार्वती के पूजन का दिवस होता है। इस दिन गुरु पुष्य का संयोग आना उन युवक-युवतियों के लिए अत्यंत लाभदायी है जिनके विवाह में बाधा आ रही है। जिनका विवाह नहीं हो पा रहा है। वे इस दिन शिव-पार्वती के साथ केले के पेड़ का पूजन भी करें।

– गुरु पुष्य का संयोग खरीदारी के लिए भी शुभ होता है। यदि आप भूमि, भवन, संपत्ति, आभूषण आदि खरीदना चाहते हैं तो गुरु पुष्य के पुण्यकाल में खरीद लें।

ये भी पढ़ें- Janmashtami 2022: उत्तम संतान और सुख-समृद्धि देता है जन्माष्टमी व्रतये भी पढ़ें- Janmashtami 2022: उत्तम संतान और सुख-समृद्धि देता है जन्माष्टमी व्रत

English summary

Masik Shivaratri 2022: Know date shubh muhurat puja vidhi

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Janmashtami 2022: उत्तम संतान और सुख-समृद्धि देता है जन्माष्टमी व्रत | Janmashtami vrat niyam BenefitsWhy do we celebrate Janmashtami

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भाद्रपद
माह
के
कृष्ण
पक्ष
की
अष्टमी
तिथि
के
दिन
भगवान
श्री
कृष्ण
का
जन्मोत्सव
मनाया
जाता
है।
इस
बार
जन्माष्टमी
18
और
19
अगस्त
2022
को
मनाई
जा
रही
है
किंतु
भगवान
की
कृपा
पाने
के
लिए
व्रत
19
अगस्त
को
किया
जाएगा।
जन्माष्टमी
के
दिन
व्रत
रखने
का
बड़ा
महत्व
है।
शास्त्रों
का
कथन
है
किजन्माष्टमी
का
व्रत
रखने
से
मनुष्य
को
सांसारिक
सुख,
सौंदर्य,
आकर्षण,
प्रेम,
समृद्धि
और
उत्तम
संतान
सुख
की
प्राप्ति
होती
है।

Janmashtami


जन्माष्टमी
व्रत
का
नियम

जन्माष्टमी
का
व्रत
सभी
लोग
कर
सकते
हैं।
किंतु
संतान
सुख
की
प्राप्ति
के
लिए
महिलाओं
को
यह
व्रत
अवश्य
करना
चाहिए,
बल्कि
दंपती
को
साथ
में
यह
व्रत
करना
चाहिए।
जिन
दंपतियों
की
संतान
नहीं
हैं
या
संतान
होने
के
बाद
जीवित
नहीं
रहती,
या
संतान
हमेशा
बीमार
रहती
है
तो
उन्हें
अपनी
कामनापूर्ति
का
संकल्प
लेकर
यह
व्रत
करना
चाहिए।
इस
व्रत
से
पापों
की
निवृत्ति

सुखों
की
वृद्घि
होती
है।
व्रती
को
उपवास
की
पूर्व
रात्रि
में
अल्पाहारी
रहना
चाहिए,
साथ
ही
इंद्रियों
पर
काबू
रखना
चाहिए।
तिथि
विशेष
पर
प्रात:
स्नान
कर
सूर्य,
सोम
(चंद्रमा),
पवन,
दिग्पति
(चार
दिशाएं),
भूमि,
आकाश,
यम
और
ब्रह्म
आदि
को
नमन
कर
उत्तर
मुख
बैठना
चाहिए।
हाथ
में
जल-अक्षत-कुश
लेकर
मास-तिथि-पक्ष
का
उच्चारण
कर
अपनी
अभीष्ट
कामना
की
पूर्ति
का
संकल्प
लेना
चाहिए।
क्लीं
कृष्णाय
नम:
मंत्र
का
जाप
स्फटिक
की
माला
से
करना
चाहिए।
दिनभर
निराहार
रहें।
क्षमता

हो
तो
फलाहार
ले
सकते
हैं।
रात्रि
में
12
बजे
श्रीकृष्ण
का
जन्म
करवाकर
प्रसाद
ग्रहण
कर
व्रत
खोला
जाता
है।


जन्माष्टमी
व्रत
के
लाभ


जन्माष्टमी
का
व्रत
निसंतान
दंपतियों
को
अवश्य
करना
चाहिए।


जन्माष्टमी
व्रत
उन
दंपतियों
को
करना
चाहिए
जिनकी
संतान
जीवित
नहीं
रहती।


जिन
स्ति्रयों
की
संतानें
बीमार
रहती
हैं,
उन्हें
जन्मजात
कोई
रोग
है,
उन्हें
जन्माष्टमी
व्रत
जरूर
करना
चाहिए।


जिन
दंपतियों
की
संतानें
गलत
रास्ते
पर
चली
गई
हैं,
कहना
नहीं
मानती
हैं,
उन्हें
भी
जन्माष्टमी
व्रत
करना
चाहिए।


जन्माष्टमी
व्रत
से
आकर्षण
प्रभाव
में
वृद्धि
होती
है।
फिर
सब
लोग
आपकी
बात
मानने
लगते
हैं।


इससे
सौंदर्य
में
वृद्धि
होती
है।
वाणी
का
ओज
प्राप्त
होता
है।


प्रेम
की
चाह
रखने
वाले
युवक-युवतियों
को
जन्माष्टमी
व्रत
रखकर
विधि
विधान
से
श्रीकृष्ण
का
पूजन
करना
चाहिए।


सुख-समृद्धि
में
वृद्धि
करने
के
लिए
जन्माष्टमी
व्रत
जरूर
करें।

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पढ़ें-
Janmashtami
2022:
इस
बार
दो
दिन
मनेगी
जन्माष्टमी,
मथुरा-द्वारका
में
होगी
19
अगस्त
को

English summary

Janmashtami vrat niyam BenefitsWhy do we celebrate Janmashtami

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Ekadashi: 22 अगस्त से शुरू हो रहा है एकादशी, जानिए अजा एकादशी व्रत की विधि | Aja Ekadashi date tithi muhurat vrat katha time and importance

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भाद्रपद
माह
के
कृष्णपक्ष
की
एकादशी
अजा
एकादशी
कहलाती
है।
यह
एकादशी
23
अगस्त
2022,
मंगलवार
को

रही
है।
इस
एकादशी
का
व्रत
करने
से
भगवान
विष्णु
के
साथ
मां
लक्ष्मी
की
कृपा
प्राप्त
होती
है।
इस
बार
मंगलवार
के
दिन
एकादशी

रही
है
इसलिए
भूमि,
भवन
के
कार्यो
और
उत्तम
संपत्ति
सुख
की
प्राप्ति
की
कामना
रखने
वालों
को
इस
एकादशी
का
व्रत
अवश्य
करना
चाहिए।
अजा
एकादशी
का
व्रत
करने
से
अश्वमेघ
यज्ञ
करने
के
समान
पुण्य
फल
की
प्राप्ति
होती
है।
इस
व्रत
को
करने
से
हरिद्वार
आदि
तीर्थ
स्थानों
में
स्नान,
दान
आदि
का
फल
प्राप्त
होता
है।
व्रत
के
प्रभाव
से
व्यक्ति
के
ग्रहों
की
पीड़ाएं
दूर
हो
जाती
है।
व्यक्ति
समस्त
सुखों
का
भोग
करते
हुए
अंत
में
मोक्ष
को
प्राप्त
होता
है।
भगवान
विष्णु
की
कृपा
से
व्रती
की
आने
वाली
कई
पीढ़ियों
को
दुख
नहीं
भोगना
पड़ते
हैं।


अजा
एकादशी
व्रत
की
विधि

अजा
एकादशी
का
व्रती
सूर्योदय
पूर्व
उठकर
तिल
और
मिट्टी
का
लेप
करके
कुशा
डालकर
स्नान
करे।
इसके
बाद
सूर्य
को
जल
का
अ‌र्घ्य
दें
और
भगवान
विष्णु
की
पूजा
करें।
इसके
लिए
अपने
पूजा
स्थान
को
शुद्ध
कर
लें।
एक
चौकी
पर
लाल
या
पीला
वस्त्र
बिछाकर
धान्य
रखकर
उस
पर
कलश
स्थापित
करें।
कलश
पर
लाल
रंग
का
वस्त्र
सजाएं।
इस
पर
भगवान
विष्णु
की
मूर्ति
रखकर
एकादशी
व्रत
का
संकल्प
लेकर
विधि
विधान
से
पूजन
करें।
इसके
बाद
अजा
एकादशी
व्रत
की
कथा
सुनें
या
पढ़ें।
दिनभर
निराहार
रहते
हुए
भगवान
विष्णु
के
नामों
का
मानसिक
जाप
करते
रहे।
द्वादशी
के
दिन
ब्राह्मण
को
यथायोग्य
दान
दक्षिणा
दें
और
स्वयं
व्रत
खोलें।


अजा
एकादशी
की
कथा

प्राचीनकाल
में
हरिशचंद्र
नामक
एक
चक्रवर्ती
राजा
राज्य
करता
था।
किसी
जन्म
के
कर्मो
के
कारण
उसे
अपना
राज्य
और
सारा
धन
त्यागना
पड़ा।
साथ
ही
अपनी
स्त्री,
पुत्र
तथा
स्वयं
को
बेच
दिया।
वह
राजा
चांडाल
का
दास
बनकर
मृतकों
के
वस्त्र
ग्रहण
करता
था।
मगर
किसी
प्रकार
से
सत्य
से
विचलित
नहीं
हुआ।
कई
बार
राजा
चिंतित
हो
जाता
और
विचार
करने
लगता
किमैं
कहां
जाऊं,
क्या
करूं,
जिससे
मेरा
उद्धार
हो।
इस
प्रकार
राजा
को
कई
वर्ष
बीत
गए।
एक
दिन
राजा
इसी
चिंता
में
बैठा
हुआ
था
किगौतम

षि
का
आगमन
हुआ।
राजा
ने
उन्हें
देखकर
प्रणाम
किया
और
अपनी
सारी
कहानी
बताई।
यह
बात
सुनकर
गौतम
ऋषि
ने
कहा
किराजन
आज
से
सात
दिन
बाद
भाद्रपद
कृष्णपक्ष
की
अजा
नाम
की
एकादशी
आएगी,
तुम
विधिपूर्वक
उसका
व्रत
करो।
इस
व्रत
के
पुण्य
प्रभाव
से
तुम्हारे
समस्त
पाप
नष्ट
हो
जाएंगे।
इस
प्रकार
राजा
से
कहकर
गौतम
ऋषि
उसी
समय
अंतध्र्यान
हो
गए।
राजा
ने
उनके
कथनानुसार
एकादशी
आने
पर
विधिपूर्वक
व्रत

जागरण
किया।
उस
व्रत
के
प्रभाव
से
राजा
के
समस्त
पाप
नष्ट
हो
गए
और
फिर
से
स्त्री-पुत्र
और
धन
युक्त
होकर
राज्य
करने
लगा।


एकादशी
तिथि


एकादशी
प्रारंभ

22
अगस्त
को
प्रात:
6.06
बजे
से


एकादशी
समाप्त

24
अगस्त
को
प्रात:
8.32
बजे
तक


एकादशी
का
पारणा

24
अगस्त
को
प्रात:
6.06
से
8.30
बजे
तक

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2022:
इस
बार
दो
दिन
मनेगी
जन्माष्टमी,
मथुरा-द्वारका
में
होगी
19
अगस्त
को

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Aja Ekadashi date tithi muhurat vrat katha time and importance

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