ये भी स्वतंत्रता सेनानी थे पर इतिहास ने इन्हें भुला दिया, प्रेयसी ने विछोह में रो-रोकर दे दी थी जान | He was also a freedom fighter, but history has forgotten him, the beloved gave his life crying in separation.

0
14

  • Hindi News
  • Local
  • Mp
  • Indore
  • He Was Also A Freedom Fighter, But History Has Forgotten Him, The Beloved Gave His Life Crying In Separation.

इंदौरएक घंटा पहले

  • इंदौर में वीराज्ञात सीरीज़ के तहत शनिवार शाम रम्पा फितूरी की जीवनयात्रा पर खेला गया नाटक
नाटक का एक दृश्य...

नाटक का एक दृश्य…

रम्पा फितूरी… सुना है यह नाम ? कम ही लोगों ने सुना होगा। ऐसे ही गुमनाम वीरों की कहानी कही जाती है इस ड्रामा सीरीज़ वीराज्ञात में जो प्रयास थ्री डी की ओर से चलाई जा रही है। शनिवार को स्वतंत्रता सेनानी अल्लूरी सीताराम राजू की कहानी पर नाटक प्रस्तुत किया गया जिन्हें रम्पा फितूरी नाम दिया था। अभिनव कला समाज में प्रयास थ्री डी के कलाकारों ने इस नाटक का प्रभावी मंचन किया। इस कहानी में वह सब है जो किसी फिल्म की स्क्रिप्ट में होता है। इसमें देश के लिए मर मिटने का जज्बा है। किसी के विरह में रो-रोकर जान दे देने वाली मोहब्बत है। साज़िश है, हास्य विनोद भी है।

मां से संवाद करते रम्पा फितूरी

मां से संवाद करते रम्पा फितूरी

जान देने वाली प्रेमिका का नाम अपने नाम से जोड़ वह बने सीताराम राजू
कहानी यूं है कि पिता की मृत्यु के बाद अल्लूरी राम राजू संन्यासी हो गए थे। फिर पता चला कि असहयोग आंदोलन छेड़ा गया है तो वे गांव गांव जाकर लोगों को शराब न पीने का संदेश देने लगे। अंग्रेजी हुक्मरानों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। कुछ समय बाद उन्होंने क्रांति की राह पकड़ ली। वे थाने लूटने लगे, लेकिन वह कागज़ पर मिर्च लगाकर एक मिर्ची संदेश भेज थानों पर पहले ही बता देते थे हम आज लूटने आएंगे। एक स्कॉट था जो इनके पीछे लगा था। मां काली की पूजा में वह उसे पकड़ने आता है। अल्लूरी उसे मार गिराते हैं। इस यात्रा में उन्हें सीता नाम की लड़की मिली थी। वह उनसे प्रेम करती थी। उनकी याद में कविताएं लिखती थी लेकिन अल्लूरी ने कह दिया कि मेरा जीवन सिर्फ देश के लिए है। सीता उन्हें इतना गहरा प्रेम करती थी कि उनके विछोह में वह रो-रोकर जान दे देती है। सीता और उसके अनन्य प्रेम का मान रखते हुए अल्लूरी अपने नाम के आगे सीता का नाम जोड़ लेते हैं और अल्लूरी सीताराम राजू बन कहलाते हैं। बाद में उन्हें भी अंग्रेज पकड़ लेते हैं लेकिन उनकी मौत का कोई प्रमाण आज भी नहीं मिला है। अन्नामलाई की पहाड़ियों में आदिवासी उन्हें आज भी पूजते हैं। नाटक के अंत में सभागार वंदे मातरत के घोष से गूंज उठा। वरुण जोशी के निर्देशन में खेले गए इस नाटक को कलाकारों ने बड़ी मार्मिकता से प्रस्तुत किया। इसके लेखक रहे देव्यांश शर्मा और फैज़ान खान।

संवाद जो सबसे ज्यादा सराहे गए

  • परमेश्वर उसके शरीर को मुझसे छीन सकता है, उसकी आत्मा को नहीं। उसने तो उसी दिन अपना शरीर त्याग दिया था जिस दिन उसन मेरे लिए तपस्या करने का निर्णय लिया। उसी दिन वह मुझसे और मेरे कण-कण से जुड़ गई थी। अब वह मेरी अंतिम सांस तक मेरे साथ रहेगी।
  • धरती पर अच्छा ज्ञान ही स्वर्ग और बुरी आदतें या अज्ञान नर्क है।

खबरें और भी हैं…

Source link

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here