एक फिल्म बनाने के लिए क्या चाहिए- लड़की और बंदूक!

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1789 में हुई फ्रांस की क्रांति ने राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने में उथल-पुथल मचा दी थी. इस क्रांति के दो सदियों के बाद सिनेमा की दुनिया में भी फ्रांस ने क्रांति करने वाले फिल्मकार की झलक देखी. उनका नाम था जीन-ल्यूक गोडार्ड. गोडार्ड के साथ क्रांति की बात इसलिए, क्योंकि उनकी बनाई फिल्में न सिर्फ समय से पहले या आगे की थीं, बल्कि इतनी प्रायोगिक कि एकबारगी सभ्य समाज को झकझोर देतीं. गोडार्ड पहले फिल्म समीक्षक थे. फिर निर्देशक बने. पहली ही फिल्म बनाई ‘ब्रेथलेस’. क्राइम ड्रामा. पुलिसवाले को मारकर भागे एक अपराधी की गर्लफ्रेंड, जो अपने प्रेमी का धोखे से पुलिस एनकाउंटर करा देती है. यह फिल्म तत्कालीन सामाजिक परिदृश्य में बड़ा प्रयोग थी. इस प्रयोग को व्यापक सराहना मिली. बॉक्स ऑफिस पर भी फिल्म ने कीर्तिमान रचा और खूब कमाई की.

जीन ल्यूक गोडार्ड ने ऐसी फिल्म क्यों बनाई, इसे जानने के लिए उनके एक कथन को याद करना जरूरी है. फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतरने से पहले गोडार्ड ने लिखा था, ‘एक फिल्म बनाने के लिए आपको क्या चाहिए? एक लड़की और बंदूक! ‘ब्रेथलेस’ बनाकर अपने इस कथन को गोडार्ड ने साबित कर दिया. सिनेमा की दुनिया से जुड़ा कोई व्यक्ति अगर ऐसी बात सार्वजनिक रूप से कह दे, तो कई नाक-भौं सिकुड़ने लगेंगे. लेकिन यह बात बाकायदा कही गई…, वह भी 1960 के दशक में. गोडार्ड की बनाई ‘ब्रेथलेस’ सिर्फ एक ही प्रयोग के लिए ऑल-टाइम क्लासिक की श्रेणी में नहीं आती, बल्कि इसके निर्माण में किए गए अन्य प्रयोग भी इसे उत्कृष्ट बनाते हैं.

गोडार्ड के प्रयोग बन गए नजीर
भारतीय सिनेमा में सत्यजीत रे, बिमल रॉय और राजकपूर जैसे फिल्मकारों ने खूब प्रयोग किए हैं. सिनेमा को सफल बनाया है. सत्यजीत रे भी अपनी फिल्मों के दृश्य फिल्माने से पहले उसकी स्केच बना लेते थे. उनकी बनाई ‘पाथेर पांचाली’ इसी तरीके से बनाई और पूरी की गई है. राजकपूर और बिमल रॉय भी सिनेमा के साथ प्रयोगों के लिए जाने जाते हैं. फ्रेंच-स्विस फिल्मकार जीन ल्यूक गोडार्ड ने ऐसे तमाम प्रयोग किए, जो बाद के फिल्मकारों के लिए नजीर बन गए. उदाहरण के लिए गोडार्ड अपनी फिल्मों को फिल्माते वक्त लिए जाने वाले फैसलों के लिए मशहूर हैं. यानी सीन के फिल्मांकन के समय ही डायलॉग बताना, दृश्य में बदलाव कर देना. फिल्म के संपादन में उनका आजमाया तरीका जिसे ‘जंप कट’ कहा जाता है, ‘ब्रेथलेस’ में इसका खूब इस्तेमाल है.

स्क्रिप्ट में ऑन-स्पॉट बदलाव
गोडार्ड की अन्य फिल्मों ‘अल्फाविले’, ‘क्रेजी पीट’ ‘माई लाईफ टू लिव’ और ‘द लिटल सोल्जर’ जैसी कृतियों में डॉक्युमेंट्री जैसा फिल्मांकन खूब सराहा गया. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, गोडार्ड की फिल्मों के कलाकारों को अक्सर ये मालूम ही नहीं होता था कि उनके डायलॉग कब बदल जाएंगे. गोडार्ड की इस प्रयोगधर्मिता को कई बार आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ा. खासकर विवादित विषयों पर बनी उनकी फिल्मों से तो कई बार आलोचक भी बेचैन हो जाते थे. लेकिन इससे जीन ल्यूक गोडार्ड को न कभी फर्क पड़ा और न पड़ना था.

डायरेक्टर की फिल्म
जीन ल्यूक गोडार्ड फिल्म निर्देशक बनने से पहले समीक्षक थे, जो एक ही फिल्म कई-कई बार देखा करता था. इसलिए जब उन्होंने अपनी फिल्में बनाई तो कभी समझौता नहीं किया. गोडार्ड और नई धारा की सिनेमा बनाने वाले उन जैसे तमाम निर्देशक इस एक बात पर दृढ़ता से अमल करते थे कि ‘फिल्म वैसी ही बनेगी जैसा डायरेक्टर चाहता है’. समीक्षक होने के तौर पर वे जानते थे कि फिल्में कैसी होनी चाहिए. मशहूर फिल्म पत्रिका ‘कैहियर्स डू सिनेमा’ में उन्होंने लंबे समय तक लिखा. अपनी समीक्षाओं में गोडार्ड फिल्मों की आलोचना करते समय उसकी कमी-बेसी दोटूक बताते थे. इसलिए जब पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उनकी फिल्म ‘हेली मैरी’ की निंदा की, तब भी गोडार्ड अपने स्टाइल से पीछे नहीं हटे.

Tags: Cinema

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